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Arjun Dey

घर चल, घर चल,

Trained classical, quit at 20 to make pop his teacher would hate

the numbers

bpm
99
key
F major
energy
0.70
dance
0.94
valence
0.57
vocal at
2.4s
length
3:24
language
Hi

lyrics

गली के मोड़ पे रुकी साइकिल,

घड़ी ने काटी एक बजने की सीढ़ी।

तुम्हारे गिलास में बची थी दालचीनी,

मेरे हाथ में बस नमक लगी उँगली।

रिक्शे की सीट पर धूल की लकीर,

जेब में पड़ी है माचिस की तीली।

हावड़ा की तरफ़ से आई एक सीटी,

और मेरे जूते में फँसी है कीचड़ गीली।

कदम धीमे हैं, पर रास्ता वही,

चाय की दुकान बंद, शटर है नहीं।

मैं सीधा नहीं, थोड़ा-सा झुका,

तेरे दरवाज़े तक बस पहुँचना सही।

घर चल, घर चल,

घर चल, घर चल।

घर चल, घर चल,

घर चल, घर चल।

पान की दुकान ने दी लाल रोशनी,

कागज़ के कप में बची ठंडी चाय।

तुमने जो कहा था, वो अभी भी बजता,

मेरे कान के पास, बस बाएँ तरफ़ भाई।

टिन की छतों से टपका सा पानी,

पीछे से गुज़री एक देर की ट्राम।

मैंने जेब में रखी वो टूटी-सी बटन,

और नाम लिया बस एक बार, आराम।

घर चल, घर चल,

घर चल, घर चल।

घर चल, घर चल,

घर चल, घर चल।

सीढ़ियाँ चढ़ूँ तो जूते बोलें,

जेब में बजती है सूखी चाभी।

अगर तू सोई है, तो ठीक है,

मैं दरवाज़े तक रख दूँ ख़ामोशी।

घर चल, घर चल,

घर चल, घर चल।

घर चल, घर चल,

घर चल, घर चल।